दिल्ली का लौह स्तंभ

वैदिक साहित्य में बहुत सी उन्नत तकनीकों का वर्णन है, जो कभी-कभी हमारी आधुनिक तकनीकी दुनिया में उपयोग की जाने वाली तकनीकों से भी अधिक परिष्कृत होती हैं।

आधुनिक धातुकर्मी (Metallurgists) दिल्ली के 22 फुट ऊंचे लोहे के स्तंभ से तुलनीय गुणवत्ता के लोहे का उत्पादन नहीं कर पाए हैं, जो पुरातन काल से लोहे का सबसे बड़ा हाथ से बना हुआ ब्लॉक है।

यह स्तंभ प्राचीन भारत में ज्ञात धातु विज्ञान के अत्यधिक उन्नत वैज्ञानिक ज्ञान का मूक गवाह है। लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से,  साढ़े छह टन का यह स्तंभ लगभग दो सहस्राब्दी से अधिक जंग रहित है और यहां तक कि 1737 में दिल्ली पर नादिरशाह के हमले के दौरान तोप के सीधे प्रहार को भी झेल चुका है।

इस स्तंभ के बारे में कहा जाता है कि यह लगभग 2300 वर्ष पुराना है। यह लगभग 6.7 मीटर ऊंचा है – जमीन के नीचे का हिस्सा केवल 0.5 मीटर है। इसका व्यास शीर्ष पर 4 सेमी से नीचे 42 सेमी तक भिन्न होता है। वर्ष 1871 में खुदाई करने पर प्याज के समान एक बल्ब के आकार का तल दिखाई दिया, जिसमें आठ छोटी मोटी छड़ें जुड़ी हुई थीं। इस स्तंभ का वजन करीब 6.5 टन है।

लौह स्तंभ के इतिहास की एक झलक इसके निर्माण के वर्ष और इसके पीछे के कारण का संकेत देती है। हालांकि दिल्ली के लौह स्तंभ का इतिहास अभी भी शोध के अधीन है और इसकी उत्पत्ति के कई संस्करण प्रस्तुत करता है, यह हमें लौह स्तंभ के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी देता है।
विद्वानों के अनुसार, महरौली लौह स्तंभ का निर्माण गुप्त शासनकाल (320-495 ईस्वी) के प्रारंभिक काल के दौरान किया गया था। लौह स्तंभ पर अभिलेख के तीसरे पद में, विद्वानों ने “चंद्र” नाम का उल्लेख पाया है जो गुप्त वंश के शासकों को दर्शाता है। हालाँकि, इस पर अलग-अलग मत हैं कि क्या चंद्र शब्द राजा समुद्रगुप्त (340-375) या चंद्रगुप्त द्वितीय (375-415) का प्रतिनिधित्व करता है जो राजा समुद्रगुप्त का पुत्र था। ऐसा भी माना जाता है कि इसे हिंदू भगवान, भगवान विष्णु के सम्मान में बनाया गया था।

कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, दिल्ली के लौह स्तंभ को 1050 ईस्वी में  तोमर राजा अनंगपाल द्वितीय, द्वारा नई दिल्ली में लाल कोट में मुख्य मंदिर में स्थानांतरित किय गया था। लौह स्तंभ पर अभिलेख में इसका उल्लेख है। हालाँकि, 1191 में, जब राजा पृथ्वीराज चौहान, जो अनंगपाल के पोते थे, मुहम्मद गोरी सेना से पराजित हुए, तब कुतुब-उद-दीन ऐबक ने लाल कोट में कुव्वत-उल-इस्लाम नामक एक मस्जिद का निर्माण किया। तब इस स्तंभ को अपने मूल स्थान से मस्जिद के सामने  स्थपित किय गया था।

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