विश्व विज्ञान में सनातन धर्म का योगदान

प्राचीन भारत मानव संस्कृति, विज्ञान और चिंतन के क्षेत्र में अत्यंत विकसित था। जिस समय विश्व में अन्यत्र संस्कृति का बीज भी उत्पन्न नहीं हुआ था, उस समय भारत की संस्कृति अत्यंत विकसित थी। हमारे पूर्वजों ने आध्यात्मिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में अनेक प्रकार के चिंतन किए और विज्ञान के कई अद्भुत रहस्यों से पर्दा उठाया। परंतु यह हमारा दुर्भाग्य है कि उस प्रकार के उत्कृष्ट चिंतन के कुछ अंश ही आज उपलब्ध हैं। मुख्यतः विज्ञान में किए गए चिंतन और खोजों के अधिकतम अंश आज उपलब्ध नहीं हैं। परंतु विज्ञान के क्षेत्र के जो अंश उपलब्ध हैं, उनका भी ज्ञान भारत के लोगों को नहीं है।

ईसा की पहली और दूसरी शताब्दी में भारत में विज्ञान की बहुत सी शाखाएं विकसित हुई : भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, खगोल शास्त्र, गणित तथा वनस्पति शास्त्र इत्यादि।
विडंबना देखिए कि हमें यह सुनना पड़ता है कि विज्ञान का प्रारंभ और विकास पश्चिम के देशों में हुआ, जबकि वास्तविकता यह है कि विज्ञान का प्रादुर्भाव सनातन भारत में हुआ था। ज्ञान के अभाव में लोग भी इस पर सहज विश्वास कर लेते हैं। अत्यंत दुख की बात है कि हमारे शिक्षा संस्थान भी इसी मिथ्या को पढ़ाने में लगे हुए हैं।

विज्ञान के क्षेत्र में जो चिंतन और खोजें हमारे पूर्वजों ने हमारे देश में की, उनको आधुनिक लोगों को जानना चाहिए। तभी उनका सनातन धर्म के प्रति उनका आदर भाव बढ़ेगा। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर यह लेख लिख रहा हूं।

 

गणित

वेदों और अन्य वैदिक ग्रंथों में गणित के अंशों का विशेष रूप से उल्लेख है। संपूर्ण विश्व के विद्वानों का तथ्यों के आधार पर यह मानना है कि भारत से ही गणित के बहुत से विषयों का आरंभ हुआ। अंकगणित, बीजगणित, भूमिती, त्रिकोणमिति जैसे विषयों के बहुत से मौलिक अनुसंधान भारत में किए गए, ऐसे तथ्य वेदों के अध्ययन से प्राप्त होते हैं।

उदाहरण के तौर पर वर्तमान समय में दशमलव पद्धति व्यवहार में है, जिसके अनुसार 1 से 9 तक अंक तथा शून्य का उपयोग होता है। स्थान परिवर्तन से अंकों के मान में भी परिवर्तन हो जाता है। आपको यह जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि यह दशमलव पद्धति 2000 वर्षों से भारत में थी, यह तथ्य कई शिलालेखों में अंको के क्रमिक विकास से सामने आता है।

यूरोप के इतिहास में एक बहुत ही प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ है – CONDEX VIGILANUS। इस ग्रंथ में 1 से 9 तक के अंको का उल्लेख किया गया है और इन अंकों के विषय में इस ग्रंथ में लिखा है कि: गणित चिन्हों के उपयोग के समय हमें यह अवश्य जान लेना चाहिए कि प्राचीन हिंदुओं की बुद्धि अत्याधिक तीक्ष्ण और व्यापक थी। गणना, भूमिती और अन्य शास्त्रों के विषय में भी अन्य देश हिंदुओं के अनुयाई हैं, क्योंकि इन विषयों में हिंदू ही अग्रणीय हैं। 9 अंकों का उपयोग, अंकों के आधार पर उनके मूल्यों का निश्चय इत्यादि इस संदर्भ में प्रमाण हैं।
अरब और यूरोप के लोगों को नवी शताब्दी तक दशमलव पद्धति का ज्ञान नहीं था।

शून्य

संस्कृत भाषा के अनुसार शून्य शब्द अस्तित्व शून्यता को सूचित करता है। संस्कृत भाषा का यह शून्य ही अरब भाषा में प्रविष्ट हुआ और वहीं से लैटिन भाषा में पहुंचा, जहां से यह जीरो के नाम से विश्व में प्रसिद्ध हो गया।

शून्य की खोज का मूल कारण था, अंकों के स्थान पर आधारित मान के निर्धारण की पद्धति।
जीरो या शून्य वास्तव में उस चिन्ह का मान है जो अस्तित्व शून्यता निर्धारित करता है।

 

वर्गमूल, घनमूल

किसी संख्या के वर्गमूल और घनमूल को प्राप्त करने के लिए आधुनिक गणित में जो पद्धति अपनाई गई है वह पद्धति आर्यभट्ट ने पांचवी (499 ईसवी) शताब्दी में ही खोज ली थी।
आर्यभट्ट का नियम इस प्रकार हैः

भागं हरेद्वर्गान्नित्यं द्विगुणेन वर्गमूलेन।
वर्गाद्वर्गे शुद्धे लब्धं स्थानान्तरे मूलम्।।

 

 

बीजगणित

बीजगणित का प्रारंभ वेदांग से ही हुआ है। शुक्ल यजुर्वेद के शुल्व सूत्र से ही बीजगणित का प्रारंभ हुआ है।
रेखीय हल (Solutions of Linear) तथा क्रमिक समीकरण(Simultaneous Equations)- दोनों पर भारतीय बीज गणित के क्षेत्र में विस्तृत चर्चा है। यज्ञ वेदियो के निर्माण कार्य के द्वारा बीजगणित की बहुत सी प्रक्रियाओं का विकास हुआ, ऐसे तथ्य वेदांगों के अध्ययन से सामने आते हैं।

 

 

बौधायन सूत्र – Pyhtagoras Theorem

वर्तमान काल में गणित की एक परिमेय जिसे हम पाइथागोरस थ्योरम के नाम से जानते हैं, वास्तव में आज से 1000 वर्ष पूर्व एक भारतीय ऋषि द्वारा प्रतिपादित है। महामुनि बौधायन और कात्यायन ने बौधायन सूत्र प्रतिपादित किया था जो इस प्रकार है :

दीर्घचतुरश्रस्याक्ष्णया रज्जु: पार्श्र्वमानी तिर्यग्मानी।
यत्पृथग्भूते कुरूतस्तदुभयं करोति ॥

 

बौधायन सूत्र का विभिन्न प्रकार की यज्ञ वेदियो के निर्माण में उपयोग किया गया है

 

क्रम योजन और संयोजन – Permutations And Combinations

नवी शताब्दी में कर्नाटक के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ वराह मिहिर ने एक श्लोक में क्रम योजन और संयोजन पद्धति का उल्लेख किया है जो इस प्रकार है:

एकाद्येकोत्तरतः पदमूर्ध्वधर्यतः क्रमोत्क्रमशः।
स्थाप्य प्रतिलोमघ्नं प्रतिलोमघ्नेन भाजितं सारम्॥

 

वर्गीय समीकरण – Quadratic Equations

वर्गीय समीकरण को हल करने के लिए जिस प्रक्रिया का आज उपयोग किया जाता है, वह 10 वीं शताब्दी में श्रीधराचार्य ने प्रतिपादित की थी, जो इस प्रकार हैंः

चतुराहतवर्गसमै रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत।
अव्यक्तवर्गरुयैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम्‌ ॥

भारत की विश्व विज्ञान को देन के संदर्भ में अपने आने वाले लेखों में हम विस्तृत चर्चा करेंगे।

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