वेद, वेदांत और सनातन धर्म

यदि आप सनातन धर्म के बारे में जानने के इक्क्षुक हैं तो आपको सनातन धर्म के धार्मिक साहित्य की जानकारी होना बहुत आवश्यक है।
आइये सनातन धर्म के साहित्य और ग्रंथो को जानने और समझने का प्रयत्न करें ।

सनातन धर्म कि कई पवित्र ग्रन्थ है जिन्हे दो भागो में बांटा गया है – श्रुति और स्मृति ।

श्रुति

श्रुति सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ हैं और सनातन काल से ही अपरिवर्तनीय हैं । श्रुति सनातन धर्म के सभी ग्रंथो के आधार माने जाते हैं। श्रुतियों का ज्ञान होने के बाद एक मनुष्य को किसी और ग्रंथ को पढ़ने की आवश्यकता नहीं रहती ।

श्रुति का शाब्दिक अर्थ है सुना हुआ, यानि ईश्वर की वाणी जो प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा सुनी गई थी ।

श्रुतिया वो ज्ञान है जिसका समाधी की सर्वश्रेष्ठ अवस्था मे ज्ञान होना माना गया है, ईश्वरीय कृपा से अनायास ही सब ज्ञान हो जाना माना गया है ।
श्रुति के अन्तर्गत वेद, सूत्र व उपनिषद् आते हैं।
वेद सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ हैं, वेद परमात्मा के मुख से निकले हुए वाक्य माने जाते हैं । वेद शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘विद्’ शब्द से हुई है। विद् का अर्थ है जानना या ज्ञान। हिंदू मान्यता के अनुसार ज्ञान शाश्वत है अर्थात् सृष्टि की रचना के पूर्व भी ज्ञान था एवं सृष्टि के विनाश के पश्चात् भी ज्ञान ही शेष रह जायेगा।
वेद श्रुति इसलिये कहे जाते हैं क्योंकि ऐसा मन जाता है कि इन वेदों को परमात्मा ने ऋषियों को सुनाया था, जब वे गहरे ध्यान में थे। वेदों को श्रवण परम्परा के अनुसार गुरू द्वारा शिष्यों को दिया जाता था और शिष्यों के द्वारा सुनकर जगत में फैलाया गया।

वेद ही हिंदू धर्म के आधार स्तम्भ हैं और संख्या में चार हैं – ऋगवेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा यजुर्वेद।

हर वेद में चार भाग हैं- संहिता, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद् ।

संहिता—मन्त्र भाग है , ब्राह्मण-ग्रन्थ – गद्य भाग है, जिसमें कर्मकाण्ड की व्याख्या की गयी है, आरण्यक – इनमें अन्य गूढ बातें समझायी गयी हैं, उपनिषद् –  वेदों में निहित सिद्धांत तथा उन पर किये गये शास्त्रार्थ ।

उपनिषद शब्द का संधिविग्रह ‘उप + नि + षद’ है, उप = निकट, नि = नीचे तथा षद = बैठना होता है अर्थात् शिष्यों का गुरु के निकट किसी वृक्ष के नीचे बैठ कर ज्ञान प्राप्ति तथा उस ज्ञान को समझने के लिये प्रश्न या तर्क करना, आत्मज्ञान, योग, ध्यान, दर्शन आदि वेदों में निहित सिद्धांत तथा उन पर शास्त्रार्थ करना ।

भगवत गीता भी श्रुति है, भगवान श्री कृष्णा द्वारा कही गयी है ।

महाभारत को पंचमवेद माना गया है। 

 

स्मृति

श्रुति यथार्थ पीढ़ी दर पीढ़ी सुने हुए ज्ञान और अनुभवों को याद करके रखना ही स्मृति है । कालांतर में जब ज्ञान को लिपिबद्ध करने की प्रथा आरम्भ हो गयी, तो पीढ़ियों से सुने हुए ज्ञान को याद कर लिपिबद्ध कर दिया गया, और यही लिपिबद्ध रचनाये स्मृति कहलायीं ।

प्रमुख स्मृतिग्रन्थ हैं:- इतिहास–रामायण और महाभारत, भगवद गीता, पुराण(18), मनुस्मृति, धर्मशास्त्र और धर्मसूत्र, आगम शास्त्र।

स्मृतियों को धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। प्रमुख रूप से 18 स्मृतियां मानी गई है। स्मृतियों को प्रमुख ऋषियों और राजा मनु ने लिखा है।

1.मनु स्मृति, 2.व्यास स्मृति, 3.लघु विष्णु स्मृति, 4.आपस्तम्ब स्मृति, 5.वसिष्ठ स्मृति, 6.पाराशर स्मृति, 7.वृहत्पाराशर स्मृति, 8.अत्रि स्मृति, 9.लघुशंख स्मृति, 10.विश्वामित्र स्मृति, 11.यम स्मृति, 12.लघु स्मृति, 13.बृहद्यम स्मृति, 14.लघुशातातप स्मृति, 15.वृद्ध शातातप स्मृति, 16.शातातप स्मृति, 17.वृद्ध गौतम स्मृति, 18.बृहस्पति स्मृति, 19.याज्ञवलक्य स्मृति और 20.बृहद्योगि याज्ञवल्क्य स्मृति।

18 मुख्य स्मृतिकार हैं- मनु, बृहस्पति, दक्ष, गौतम, यम, अंगिरा, योगीश्वर, प्रचेता, शातातप, पराशर, संवर्त, उशना, शंख, लिखित, अत्रि, विष्णु, आपस्तम्ब, हारीत।

वेदों में अत्यंत गूढ़ ज्ञान निहित है, जिसे समझना आम आदमियों के लिए सहज नहीं था । इसलिए ऋषियों ने वेदों के ज्ञान को आम जान तक पहुचाने के लिए रोचक कथाओं का सहारा लिया, इन कथाओं के संकलन को ही पुराण कहा जाता है । पुराण पौराणिक कथाओं का एक विशाल संग्रह होता है जिनमे ज्ञान और सत्य घटनाओ और कल्पनाओ का संमिश्रण होता है।
पुराण संख्या में अठारह हैं –
(1) ब्रह्मपुराण (2) पद्मपुराण (3) विष्णुपुराण (4) शिवपुराण (5) श्रीमद्भावतपुराण (6) नारदपुराण (7) मार्कण्डेयपुराण (8) अग्निपुराण (9) भविष्यपुराण (10) ब्रह्मवैवर्तपुराण (11) लिंगपुराण (12) वाराहपुराण (13) स्कन्धपुराण (14) वामनपुराण (15) कूर्मपुराण (16) मत्सयपुराण (17) गरुड़पुराण (18) ब्रह्माण्डपुराण।

 

अगर श्रुति और स्मृति में कोई विवाद होता है तो श्रुति ही मान्य होगी।

 

3 thoughts on “वेद, वेदांत और सनातन धर्म

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