एक था टाइगर – रविंद्र कौशिक।

अभी हाल में ही बॉलीवुड में एक फिल्म “टाइगर जिंदा है” जो “एक था टाइगर” फिल्म फिल्म का सीक्वल है रिलीज हुई। दोनों ही फिल्मों ने अच्छा खासा मुनाफा कमाया।
पर इन फिल्मों को बनाने वाले धूर्त फिल्मकारों ने रॉ के टाइगर – रविंद्र कौशिक को कोई क्रेडिट नहीं दिया। तथ्यों से छेड़खानी कर रॉ के एजेंट ब्लैक टाइगर की कहानी को भ्रष्ट रूप में लोगों के सामने रखा गया।
आइए जानने की कोशिश करते हैं रॉ के जांबाज,असली टाइगर – रविंद्र कौशिक की कहानी को:

रविंद्र कौशिक उर्फ नबी अहमद शाकिर, रॉ का एक जांबाज सिपाही जिसने अपना जीवन देश के नाम कुर्बान कर दिया और जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ब्लैक टाइगर की उपाधि से सम्मानित किया था।
रविंद्र कौशिक राजस्थान के श्रीगंगानगर के मूल निवासी थे। उनके पिता एयरफोर्स में कार्यरत थे। रविंद्र को थिएटर का बहुत शौक था।
एक बार रविंद्र लखनऊ में एक प्रोग्राम कर रहे थे तभी रॉ के अधिकारियों की नजर उन पर पड़ी और रविंद्र में उन्हें रॉ के सफल जासूस बनने की संभावनाएं नजर आई।
रविंद्र कौशिक में अथाह देश प्रेम था इसीलिए जब रॉ के अधिकारियों ने उन्हें रॉ का एजेंट बनने का प्रस्ताव दिया तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। रॉ ने रविंद्र को संगठन में भर्ती कर लिया और उन्हें 2 साल तक दिल्ली में गहन प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें उन्हें उर्दू सिखाई गई, इस्लाम धर्म के बारे में पढ़ाया गया तथा पाकिस्तान के बारे में – वहां की भौगोलिक स्थिति, राजनैतिक स्थिति, संस्कृति और इतिहास के बारे में जानकारी दी गई। पाकिस्तान में बोली जाने वाली पंजाबी में रविंद्र पहले ही निपुण थे।
ट्रेनिंग पूरी होने के बाद रॉ ने उन्हें 1975 मे एक गुप्त मिशन पर पाकिस्तान भेज दीया। इस्लाम धर्म की ट्रेनिंग और पाकिस्तान में बोली जाने वाली पंजाबी भाषा में निपुण होने के कारण रविंद्र को पाकिस्तान में ज्यादा दिक्कत नहीं आई, उन्होंने वहां अपना नाम नबी अहमद शाकिर रख लिया।
रविंद्र पाकिस्तानी नागरिकता पाने में सफल रहे, फिर वे कराची यूनिवर्सिटी से LLB कर पाकिस्तानी सेना में शामिल हो गए। पाकिस्तानी सेना में एक कमीशन अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए और प्रमोशन पाते हुए वे मेजर के पद तक पहुंच गए और इसी बीच उन्होंने एक आर्मी ऑफिसर की बेटी अमानत से शादी कर ली, और वह एक पुत्री के पिता भी बने।
1979 से 1983 तक रविंद्र ने पाकिस्तानी सेना और वहां की सरकार से संबंधित बहुत ही बहुमूल्य जानकारियां भारत सरकार को दी, जिससे भारत सरकार ने इस दौरान पाकिस्तान द्वारा की गई युद्ध की कई कोशिशों को सफलतापूर्वक नाकाम किया। रविंद्र के कार्य से संतुष्ट होकर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें ब्लैक टाइगर की उपाधि से सम्मानित किया।
सितंबर 1983 में रॉ ने एक एजेंट इनायत मसीहा को रविंद्र से संपर्क करने के लिए पाकिस्तान भेजा। जिसे पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया और उसे प्रताड़ित कर रविंद्र के बारे में भी जानकारी निकाल ली। रविंद्र कौशिक को भी गिरफ्तार कर लिया गया और जेल भेज दिया गया
वर्ष 1985 में रविंद्र को मौत की सजा सुनाई गई जिसे बाद में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया। रविंद्र कौशिक को 16 साल तक कारावास में रखा गया इस दौरान उन्हें कोट लखपत, मियांवाली तथा अन्य कई जेलों में रखा गया और प्रताड़ित किया गया। 16 साल के कारावास में रविंद्र को टीबी की बीमारी हो गई। 2001 में सुल्तान की सेंट्रल जेल में उन्होंने दम तोड़ दिया उन्हें जेल के पीछे ही दफना दिया गया।

तत्कालीन भारत सरकार ने रविंद्र को वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, उल्टे उन्होंने उसके सारे रिकॉर्ड नष्ट कर दिए और रॉ ने भी चुप्पी साध ली। यहां तक की उन्होंने रविंद्र की लाश को भी लेने से इंकार कर दिया। एक देशभक्त जांबाज सिपाही कि इस दुर्गति पर देश हमेशा शर्मिंदा रहेगा।

One thought on “एक था टाइगर – रविंद्र कौशिक।

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