भंसाली की पद्मावत या खिलज़ावत?


संजय लीला भंसाली और उनकी फिल्म जो कि पहले पद्मावती थी और अब पद्मावत के नाम से रिलीज हुई पिछले 1 साल से विवाद का कारण रही। अब फिल्म रिलीज हो गई है, फिल्म देखने के बाद कुछ इतिहासकारों ने तथ्यों की समीक्षा करके यह पाया कि वाकई भंसाली ने इस फिल्म में इतिहास के साथ छेड़छाड़ की है, फिल्म का 80% खिलजी के ऊपर केंद्रित है इस लिहाज से भंसाली को फिल्म का नाम पद्मावत नहीं खिलजावत रखना चाहिए था।

आपको बता दे कि भारत में पहले जौहर प्रथा नहीं थी। 1192 AD में पृथ्वीराज चौहान को हराने के बाद मुसलमान आक्रांताओं ने हिंदू स्त्रियों का बलात्कार किया, लाशों तक को नहीं छोड़ा क्योंकि इस्लाम में लाशों का बलात्कार करने का भी प्रावधान है। इस सबको ध्यान में रखते हुए, इस समय के बाद हुए लड़ाइयों में जब भी ऐसा प्रतीत होता था की हार निश्चित है, क्षत्राणीया जोहर कर लेती थीं। ताकि हारने के बाद आक्रांताओं को उनका मृत शरीर भी हासिल ना हो। यह सब अपनी मान मर्यादा की रक्षा के लिए किया जाता था। जोहर के बाद राजपूत केसरिया बाना पहन शाका करते थे, जिसका अर्थ होता था कि वह अपने शरीर में लहू की अंतिम बूंद तक दुश्मन से लड़ेंगे, गर्दन कट जाए तो भी धड़ लड़ते रहेंगे, इस प्रण के साथ राजपूत शाका करते थे।

क्या अर्थ होता है जौहर का? – अपने सत्तित्व की रक्षा के लिए क्षत्रिय सनातनी वीरांगनाएं खुद को सशरीर अग्नि को समर्पित कर देती थी, इसे कहते हैं जौहर। मां पद्मावती को कायर कहने वाले, लड़कर मरने की सलाह देने वाले ध्यान दें । इस्लाम मे लाश के साथ संभोग की प्रथा आज भी है। शाका, जौहर के बाद की प्रथा है। क्षत्राणीयों के पंचतत्व में विलीन होने के बाद क्षत्रिय योद्धा श्वेत वस्त्र धारण करते थे, सिर पर केसरिया बाना धारण करते थे, पंचतत्व में विलीन क्षत्राणीयों की राख अपने ललाट पर लगा रणभूमि में चल पड़ते थे, अपनी अंतिम सांस तक दुश्मनों का संहार करने के लिए।

आइये आज 1303 AD में चलते है – सर्वप्रथम प्रातःकालीन बेला में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मां पद्मावती एवं 16000 क्षत्राणियों का जौहर हुआ। फिर क्षत्रियों का शाका हुआ। रणभूमि में राजपूतों ने अदम्य साहस वीरता का परिचय दिया। क्षत्रियों की पराजय के बाद खिलजी ने चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश किया। जहां उसके हाथ निराशा लगी, राख का ढेर लगा। खिलजी चित्तोड़ की कमान अपने बेटे ख़िज़्र खाँ को सौंपकर दिल्ली लौट गया।

आइए देखें भंसाली ने पद्मावत में क्या दिखाया है :

भंसाली ने अपनी फिल्म पद्मावत में शाका नहीं दिखाया। जबकि शाका, जौहर की तरह वीरता की महान प्रथा है। राजपूताना शौर्य और गौरव का प्रतीक है। भंसाली ने इतिहास के विपरीत दिखाया है अपनी फिल्म पद्मावत में। पहले रणभूमि में महारावल रतन सिंह को धोखे से मारा जाता है फिर जौहर होता है। यह गलत है इतिहास के विपरीत है। वास्तविकता यह है, कि पहले जौहर हुआ उसके पश्चात शाका एवं युद्ध हुआ। क्या ये इतिहास से छेड़छाड़ नहीं है? सनातन क्षत्रियत्व की शाका जैसी गौरवशाली प्रथा को ना दिखाना एवं पहले युद्ध फिर जौहर दिखाना, यह इतिहास से छेड़छाड़ नहीं है तो क्या है?

भंसाली की पद्मावत में दिखाया गया है खिलजी अकेला ही चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश करता है। दुर्ग की प्राचीर पर बेहताशा पागलों की तरह दौड़ता रहता है। 16000 वीरांगनाओं के बीच भी जाता है। खिलजी का अकेला दुर्ग में प्रवेश? – बेहद हास्यास्पद है।

सत्य यह है कि जब खिलजी की सेना गयी थी दुर्ग में, तो सिवाय राख और निराशा के उनके हाथ कुछ नहीं लगा, क्योंकि जौहर सुबह ही हो चुका था। यदि भंसाली की फिल्म के अनुसार जौहर बाद में हुआ होता, खिलजी के दुर्ग में प्रवेश के बाद, तो क्या खिलजी एवं उसकी सेना होने देती जौहर ? हास्यास्पद नहीं है ये?

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महारावल रतनसिंह जब अंतिम युद्धरत रहते है उनका केसरिया बाना कहाँ है ? शाका का मतलब ही होता है केसरिया बाना धारण करना, श्वेत वस्त्र धारण करना। ना शाका दिखाया ना श्वेत वस्त्र, ना महारावल के माथे पे केसरिया बाना ।

घूमर नृत्य के बोल राजपूताना घूमर नृत्य के बोल नहीं है । वास्तविक राजपूताना घूमर नृत्य यू-ट्यूब पर उपलब्ध है आप देखिये सुनिए उसके बोल। कुछ धूर्त कम्युनिस्ट इतिहासकारों और समीक्षकों के अनुसार, यह गौरी पूजा नृत्य था, जो जायज था। आज इक्कसवीं सदी में गौरी गणगौर जगदम्बा चामुंडा भवानी एकलिंग जी पूजा में भी जागीर की ठकुराइन कभी नृत्य नहीं करती हैं। वर्जित है, फिर 800 साल पहले के रूढ़िवादी समाज, राजपुताना आन बान शान के परिवेश में साक्षात चित्तोड़ की महारानी का नृत्य कैसे और क्यों ?

इस फ़िल्म में ऐतिहासिक पात्रों व तथ्यों से छेड़छाड़ के लिए इतिहास भंसाली को माफ नहीं करेगा ।

One thought on “भंसाली की पद्मावत या खिलज़ावत?

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